वैसे निशा में लड़कों वाली ताक़त भी है. घर पर जब मज़ाक में हम दोनों
में हाथापाई हो जाती है तो उसे हरा पाना आसान नहीं होता. कई बार तो वो मुझे
ही गिरा देती है.
पहले मेरे बहुत दोस्त थे. लेकिन अब ज़्यादातर पीछे छूट गए हैं क्योंकि वो मुझसे किन्नरों से दोस्ती करवाने के लिए कहते थे.
उनका दिमाग सिर्फ़ सेक्स तक सीमित था. वो न तो किन्नरों को लेकर गंभीर थे और न ही मेरी सोच समझते थे.
निशा के समूह की मुखिया मुझे अपने दामाद की तरह इज्ज़त देती हैं.
निशा ने शादी से पहले घर छोड़ा था. इस बात को दस साल से ज़्यादा हो गए हैं. तब से लेकर आज तक उसने कभी अपने घरवालों से बात नहीं की.
वो अपने भाई और पिता की शक़्ल भी नहीं देखना चाहती. उसे लगता है कि वह किन्नर है तो उसे पिता की संपत्ति में भी उसका कोई अधिकार नहीं बचा. पिता के बाद निशा के बड़े भाई को दोनों का हिस्सा मिलेगा.
मेरे घर में भी ज़्यादातर लोग मुझसे बात करने से बचते हैं. हमारे ज़्यादातर रिश्तेदारों ने कहा कि वो मुझसे तभी मिलेंगे, जब मैं निशा को छोड़ दूंगा. तो मैंने रिश्तेदारों को ही छोड़ दिया.
वो शादी के लिए तीन लड़कियों के प्रस्ताव ला चुके हैं. लेकिन मेरी शर्त थी कि मैं शादी के बाद भी निशा का साथ नहीं छोडूंगा. ये बात मैं उन्हें टहलाने के लिए कह देता हूँ.
वहीं शादी की बात भी होती है तो निशा का डर बढ़ने लगता है, कि कहीं मैं उसे छोड़कर न चला जाऊं.
इसी डर में वो मुझे फ़ेसबुक और व्हॉट्सऐप इस्तेमाल करने से रोकती है. ताकि किसी और लड़की के चक्कर में न पड़ जाऊं. मैं इस बात पर बड़ा हंसता हूँ.
अब उसकी बात सही लगने लगी है. हालांकि उस वक़्त मैंने उन्हें कहा था, "माँ ये दिल की लगी है, नहीं छूट रही..."
माँ के जाने के बाद घर में किसी ने मुझसे सीधे मुँह बात नहीं की. वो ये कहकर मुझे डराते ज़रूर हैं कि जैसे-जैसे बुढ़ापा आयेगा, जीवन मुश्किल होता जायेगा.
मैं प्यार करता हूँ निशा से. सच्चा प्यार. मैं इसके साथ ही पूरी लाइफ़ बिता दूंगा. मुझे इससे मतलब नहीं है कि ये लड़का है, लड़की है या किन्नर. मेरा इससे दिल मिलता है. बस यही है.
मेरी बस दो ख़्वाहिशें हैं. एक, इस कमरे से थोड़ा बड़ा घर खरीदना है जहाँ हम तरीक़े से रह सकें.
और दूसरा, एक बच्चे को गोद लेकर उसकी शादी करनी है. मैं अपनी शादी में कुछ ख़र्च नहीं कर पाया. बारात भी नहीं देखी और दावत भी नहीं कर पाया था.
हालांकि निशा किसी बच्चे को गोद लेने के ख़याल से डरती है. उसे लगता है कि किसी बच्चे को अपने जीवन में लाना आसान नहीं होगा.
ये
पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. बीते जुलाई और अगस्त में इलाहाबाद और पुणे में अमित शाह की रैलियों में भी काले कपड़े प्रतिबंधित किए गए.
एक तरह से प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों के दौरान काले रंग पर 2016 से ही अघोषित पाबंदी है और अब जब पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा हो चुकी है, इन दोनों नेताओं की जनसभाओं की संख्या बढ़ेगी और इसी के साथ काले कपड़ों को लेकर ये सख्ती बढ़ने की गुंजाइश है.
मोदी-शाह के ख़िलाफ़ विपक्षी दलों-संगठनों द्वारा काले झंडे दिखाए जाने की घटनाएं अभी छिटपुट ही हुई हैं, लेकिन जैसे-जैसे आर्थिक-सामाजिक मोर्चों पर सरकार को लेकर लोगों में नाराज़गी दिख रही है, वैसे-वैसे प्रशासनिक चौकसी भी बढ़ रही है.
कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री को राजस्थान में और फिर तमिलनाडु में द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम द्वारा कावेरी जल-विवाद पर सरकार की टालमटोल के ख़िलाफ़ काले झंडे दिखाए गए.
उत्तर प्रदेश में भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जन-असंतोष बढ़ रहा है और लखनऊ की एक छात्रा पूजा शुक्ला को जून में योगी के सामने काला झंडा दिखाने के लिए पच्चीस दिन तक जेल में रहना पड़ा.
जुलाई 2018 में जब नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश गए तो पुलिस ने पूजा शुक्ला को गड़बड़ी फैलाने की आशंका में पहले ही पकड़ लिया.जस्थान में जब मोदी की सभा में काले कपड़े ही नहीं बल्कि काली पगड़ियां पहने हुए सिख श्रोताओं को भी परेशानी उठानी पड़ी तो प्रदेश के कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने कहा, "कांग्रेस की जनसभाओं में किसी भी रंग पर पाबंदी नहीं है. काला, पीला, हरा, नीला, लाल, नारंगी, सभी रंगों का स्वागत है."
एक सभा में राहुल गांधी भी शायद भाजपा को जवाब देने के लिए ही कह चुके हैं कि "अगर मेरी सभाओं में कुछ लोग काले झंडे दिखाते हैं तो यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है. मैं उनका स्वागत करूँगा."
पहले मेरे बहुत दोस्त थे. लेकिन अब ज़्यादातर पीछे छूट गए हैं क्योंकि वो मुझसे किन्नरों से दोस्ती करवाने के लिए कहते थे.
उनका दिमाग सिर्फ़ सेक्स तक सीमित था. वो न तो किन्नरों को लेकर गंभीर थे और न ही मेरी सोच समझते थे.
निशा के समूह की मुखिया मुझे अपने दामाद की तरह इज्ज़त देती हैं.
निशा ने शादी से पहले घर छोड़ा था. इस बात को दस साल से ज़्यादा हो गए हैं. तब से लेकर आज तक उसने कभी अपने घरवालों से बात नहीं की.
वो अपने भाई और पिता की शक़्ल भी नहीं देखना चाहती. उसे लगता है कि वह किन्नर है तो उसे पिता की संपत्ति में भी उसका कोई अधिकार नहीं बचा. पिता के बाद निशा के बड़े भाई को दोनों का हिस्सा मिलेगा.
मेरे घर में भी ज़्यादातर लोग मुझसे बात करने से बचते हैं. हमारे ज़्यादातर रिश्तेदारों ने कहा कि वो मुझसे तभी मिलेंगे, जब मैं निशा को छोड़ दूंगा. तो मैंने रिश्तेदारों को ही छोड़ दिया.
लड़कियों के प्रस्ताव
हालांकि, बीते दो सालों में परिवार के लोगों ने ये दबाव बढ़ाया है कि मैं किसी लड़की से शादी कर लूं. उन्हें ये लगता रहता है कि मेरी राय बदलेगी.वो शादी के लिए तीन लड़कियों के प्रस्ताव ला चुके हैं. लेकिन मेरी शर्त थी कि मैं शादी के बाद भी निशा का साथ नहीं छोडूंगा. ये बात मैं उन्हें टहलाने के लिए कह देता हूँ.
वहीं शादी की बात भी होती है तो निशा का डर बढ़ने लगता है, कि कहीं मैं उसे छोड़कर न चला जाऊं.
इसी डर में वो मुझे फ़ेसबुक और व्हॉट्सऐप इस्तेमाल करने से रोकती है. ताकि किसी और लड़की के चक्कर में न पड़ जाऊं. मैं इस बात पर बड़ा हंसता हूँ.
दो आख़िरी ख़्वाहिशें
मेरी माँ अपने अंतिम दिनों में कहा करती थी, "बेटा मत पड़ इन चक्करों में. जवानी के साथ सब चला जायेगा. घर महिला से ही चलता है. तू सबसे छोटा है. मेरे मरने के बाद तुझे कोई नहीं पूछेगा."अब उसकी बात सही लगने लगी है. हालांकि उस वक़्त मैंने उन्हें कहा था, "माँ ये दिल की लगी है, नहीं छूट रही..."
माँ के जाने के बाद घर में किसी ने मुझसे सीधे मुँह बात नहीं की. वो ये कहकर मुझे डराते ज़रूर हैं कि जैसे-जैसे बुढ़ापा आयेगा, जीवन मुश्किल होता जायेगा.
मैं प्यार करता हूँ निशा से. सच्चा प्यार. मैं इसके साथ ही पूरी लाइफ़ बिता दूंगा. मुझे इससे मतलब नहीं है कि ये लड़का है, लड़की है या किन्नर. मेरा इससे दिल मिलता है. बस यही है.
मेरी बस दो ख़्वाहिशें हैं. एक, इस कमरे से थोड़ा बड़ा घर खरीदना है जहाँ हम तरीक़े से रह सकें.
और दूसरा, एक बच्चे को गोद लेकर उसकी शादी करनी है. मैं अपनी शादी में कुछ ख़र्च नहीं कर पाया. बारात भी नहीं देखी और दावत भी नहीं कर पाया था.
हालांकि निशा किसी बच्चे को गोद लेने के ख़याल से डरती है. उसे लगता है कि किसी बच्चे को अपने जीवन में लाना आसान नहीं होगा.
ये
पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की दो अलग-अलग सभाओं (राजस्थान के जयपुर
और छत्तीसगढ़ के भिलाई) में पुरुषों ही नहीं महिलाओं की काले रंग की चुन्नियां और अंतर्वस्त्रों जांच करने की ख़बर सामने आई है.
यह एक अश्लीलता तो है ही और आम नागरिकों के सम्मान पर आक्रमण से कम नहीं है. पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. बीते जुलाई और अगस्त में इलाहाबाद और पुणे में अमित शाह की रैलियों में भी काले कपड़े प्रतिबंधित किए गए.
एक तरह से प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों के दौरान काले रंग पर 2016 से ही अघोषित पाबंदी है और अब जब पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा हो चुकी है, इन दोनों नेताओं की जनसभाओं की संख्या बढ़ेगी और इसी के साथ काले कपड़ों को लेकर ये सख्ती बढ़ने की गुंजाइश है.
मोदी-शाह के ख़िलाफ़ विपक्षी दलों-संगठनों द्वारा काले झंडे दिखाए जाने की घटनाएं अभी छिटपुट ही हुई हैं, लेकिन जैसे-जैसे आर्थिक-सामाजिक मोर्चों पर सरकार को लेकर लोगों में नाराज़गी दिख रही है, वैसे-वैसे प्रशासनिक चौकसी भी बढ़ रही है.
कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री को राजस्थान में और फिर तमिलनाडु में द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम द्वारा कावेरी जल-विवाद पर सरकार की टालमटोल के ख़िलाफ़ काले झंडे दिखाए गए.
उत्तर प्रदेश में भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जन-असंतोष बढ़ रहा है और लखनऊ की एक छात्रा पूजा शुक्ला को जून में योगी के सामने काला झंडा दिखाने के लिए पच्चीस दिन तक जेल में रहना पड़ा.
जुलाई 2018 में जब नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश गए तो पुलिस ने पूजा शुक्ला को गड़बड़ी फैलाने की आशंका में पहले ही पकड़ लिया.जस्थान में जब मोदी की सभा में काले कपड़े ही नहीं बल्कि काली पगड़ियां पहने हुए सिख श्रोताओं को भी परेशानी उठानी पड़ी तो प्रदेश के कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने कहा, "कांग्रेस की जनसभाओं में किसी भी रंग पर पाबंदी नहीं है. काला, पीला, हरा, नीला, लाल, नारंगी, सभी रंगों का स्वागत है."
एक सभा में राहुल गांधी भी शायद भाजपा को जवाब देने के लिए ही कह चुके हैं कि "अगर मेरी सभाओं में कुछ लोग काले झंडे दिखाते हैं तो यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है. मैं उनका स्वागत करूँगा."
- राजनीति में काले झंडे विरोध के साथ ही चेतावनी और संघर्ष और 'वापस जाओ' के भी प्रतीक रहे हैं. अंग्रेज़ों के राज में ही नहीं, आज़ादी के बाद भी काला रंग जलवा दिखाता रहा. साल 1953 में तमिलनाडु में द्रमुक ने जवाहरलाल नेहरू को हिंदी थोपे जाने के विरोध में काले झंडे दिखाए थे.
- साल 1977 में इमरजेंसी हटने के बाद जब सत्ता से बाहर हो चुकीं इंदिरा गाँधी तमिलनाडु गईं तो इमरजेंसी की ज़्यादतियों के ख़िलाफ़ द्रमुक ने उग्र ढंग से काले झण्डे दिखाए. प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गोलियों से दो लोगों की मृत्यु हो गई और सैकड़ों घायल हुए.
- साल 1975 में इमरजेंसी का काला दौर शुरू होने से पहले ही इंदिरा गाँधी की सभाओं में काले रंग की अघोषित मनाही थी और पुलिस गहरी तलाशी लेती थी. काले कपड़े ही काले रूमाल तक पाए जाने पर पुलिस हरकत में आ जाती थी. उस समय के राजनीतिक माहौल में इंदिरा गाँधी का विरोध बहुत बढ़ गया था, चारों ओर तानाशाही और दमन की आशंका व्याप्त थी और गुजरात, बिहार में युवकों के आन्दोलन उग्र हो रहे थे. लेकिन तब कोई सोच भी नहीं सकता था कि काले रंग की पगड़ियों-चुन्नियों और अंतर्वस्त्रों तक को ख़तरे का संकेत माना जाएगा.
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