Friday, August 31, 2018

बच्ची बोली- पेट में दर्द होता है, टेस्ट हुआ तो डॉक्टर के उड़ गए होश

मध्य प्रदेश में गैंगरेप की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही है. यहां भोपाल रेलवे स्टेशन के पास एक जर्जर मकान में एक 12 साल की बच्ची के साथ 4 लोगों ने गैंगरेप किया. बताया जा रहा है कि घटना 3 नवंबर की है. उस वक्त जब जीआरपी को इसकी खबर मिली थी तो उन्होंने पल्ला झाड़ लिया.
इसके बाद जब मीडिया में यह खबर आई तो जीआरपी ने आनन-फानन में मामला दर्ज किया. जब मंगलवार को पीड़ित बच्ची का मेडिकल टेस्ट कराया गया तो पुलिस और डॉक्टर के होश उड़ गए. टेस्ट में बच्ची को 4 माह का गर्भ होने की बात सामने आई. फिलहाल उसे भोपाल के सुल्तानिया अस्पताल में भर्ती कराया गया है.
दैनिक भास्कर के मुताबिक, बच्ची अपने भाई को ढूंढते हुए जबलपुर से भोपाल आ गई थी. भाई को खोजने के लिए वह रेलवे स्टेशन पर ही सोती थी. इस बीच बच्ची पर कुछ दरिंदों की नजर पड़ी.
वह उसे चॉकलेट देने के बहाने सुनसान जगह ले जाते थे और वहां गैंगरेप करते. बच्ची ने जीआरपी को बताया कि उसे अक्सर पेट में दर्द होता था. उसे समझ नहीं आता था कि दर्द क्यों हो रहा है. जब भी दर्द होता तो वह कुछ खा लेती थी.
इसके पहले भी उसके साथ दरिंदगी होने की बात जब बच्ची से पूछी गई तो वह चुप हो गई और फूट-फूटकर रोने लगी. फिलहाल पुलिस गैंगरेप के आरोपियों की तलाश कर रही है.
बता दें कि कुछ दिन पहले कोचिंग से लौट रही एक छात्रा के साथ भोपाल के हबीबगंज स्टेशन के पास गैंगरेप हुआ था. इस घटना के सामने आने के बाद मध्य प्रदेश पुलिस समेत रेलवे पुलिस के लगभग 10 अफसरों को सस्पेंड किया गया था. उस वक्त भी पुलिस की संवेदनहीनता नजर आई थी और मामला दर्ज नहीं किया था. इस घटना के खिलाफ भोपाल में हजारों लोग सड़कों पर उतरे थे और पुलिस प्रशासन से दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करने की मांग की थी. में निधन हुआ. मेरे लिए शर्मिंदगी की बात यह है कि मुझे उनकी मौत से कुछ समय पहले ही उनके बारे में कई अहम जानकारियां मिल सकीं और अब मैं उनपर लिख भी रहा हूं. कबूतरी के इस गीत को दुनिया भर में फैले उत्तराखंड के प्रवासियों के अलावा नेपाल में भी खूब प्यार मिला.
इस गीत में कुछ शब्द नेपाल से भी आए हैं और इस लिहाज से यह गीत पुराने समय में भारत और नेपाल की साझा संस्कृति का प्रतीक भी है. इसके अलावा, इस गीत में हमें दोनों देशों को बांटने वाली महाकाली नदी और दूसरे प्राकृतिक बिंब और वहां की सामाजिक स्थितियों का रूपण भी देखने को मिलता है.
साज बजाने हाथों से तोड़े पत्थर
उत्तराखंड की मिरासी (दलित) जाति से आने वालीं कबूतरी का जीवन संघर्ष उत्तराखंड की आम महिलाओं जैसा ही दूभर रहा, बल्कि एक बंद समाज और शिल्पकार (दलित) जाति में पैदा होने की वजह से यह उस स्तर तक कष्टप्रद रहा कि इसे महसूस करना अधिकतर के लिए बहुत मुश्किल होगा. कबूतरी जिन हाथों से साज बजाती थीं, उन्हीं हाथों से पत्थर भी तोड़ती थीं.
उत्तराखंड के दलितों की आजीविका का पारंपरिक साधन खेतिहर मजदूरी, पत्थर तोड़ना, भवन निर्माण, कृषि यंत्र और औजार बनाना और ऋतुओं के त्योहारों, शादियों और दूसरे उत्सवों में नृत्य और गायन रहा है. कबूतरी ने भी अपने माता-पिता और नानी से सात साल की उम्र से ही गायन सीख लिया था. कम उम्र में ही उनकी शादी दीवानी राम से हो गई, जो उनके लिए गीत लिखते थे और वह विभिन्न मंचों पर उन्हें गाती थीं. वही उन्हें आकाशवाणी तक भी ले गए.
आकाशवाणी ने दी पहचान
कबूतरी ने 1970 और 80 के दशक में आकाशवाणी नजीबाबाद, रामपुर, लखनऊ और मुंबई के विभिन्न भाषा के कार्यक्रमों में गायन किया. लखनऊ दूरदर्शन केंद्र से भी उनके गायन का प्रसारण हुआ. उनकी दर्जन भर से ज्यादा रिकॉर्डिंग ऑल इंडिया रेडियो के पास हैं. इसके अलावा उन्होंने क्षेत्रीय त्योहारों, रामलीलाओं, उत्तरायणी पर्वों जैसे कई मंचों पर भी गायन किया, जिसे शायद ही संरक्षित किया गया हो. पति की मृत्यु के बाद उन्होंने सामाजिक जीवन से दूरी बना ली और वह उत्तराखंड के सीमांत जिले- पिथौरागढ़ के अपने घर में रहकर मजदूरी करके अपने परिवार को पालने लगीं.
2002 में पिथौरागढ़ के छलिया महोत्सव में नवोदय पर्वतीय कला मंच उन्हें फिर से लोगों के सामने लाया और 2004 में उन्हें उत्तरा पत्रिका की संपादिका डॉ. उमा भट्ट, युगमंच, पहाड़ और नैनीताल समाचार के प्रयासों से नैनीताल में फिर से रीलॉन्च किया गया. यहां से कबूतरी का दूसरा दौर शुरू हुआ. संस्कृतिकर्मी और नाटककार जहूर आलम बताते हैं कि इस सफल कार्यक्रम को मीडिया ने भी खूब कवरेज दी और इसके बाद उन्हें देश भर से गायन के लिए बुलाया जाने लगा. डॉ. उमा भट्ट के प्रयासों से कबूतरी देवी पर एक डॉक्यूमेंटरी भी तैयार हो चुकी है. इसे कबूतरी देवी के सामने ही लोकार्पित करना था कि उनका असमय निधन हो गया.
बेगम अख्तर, तीजनबाई और कबूतरी
बुलंद आवाज की मलिका कबूतरी देवी ने संगीत की औपचारिक दीक्षा नहीं ली. जहूर आलम बताते हैं कि वह ऋतुरैण (मौसम के गीत), चौती, न्योली, छपेली, धुस्का के साथ ही अपने अंदाज में गीत, गजल और ठुमरी भी गाती थीं. उन्हें उत्तराखंड की तीजनबाई या पहाड़ की बेगम अख्तर भी कहा जाता है. उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, लोककलाओं का अध्ययन करने वाले डॉ. गिरिजा पांडे के मुताबिक कबूतरी ने अपने श्रोताओं के लिए कई बार बेगम अख्तर को भी गाया है. बेगम अख्तर और कबूतरी दोनों को बुलंद गले की गायिकाओं के तौर पर जाना जाता है. संस्कृतिकर्मी और नाटककार जहूर आलम कहते हैं कि कबूतरी देवी की बुलंद आवाज और खनकदार गले के साथ ही उनकी खरजदार आवाज एक हद तक बेगम अख्तर की गायिकी की याद दिलाती थी.
हालांकि, उत्तराखंड के रंगकर्मी और संस्कृति के अध्येता इस तुलना से सहमत नहीं दिखते. इसकी एक वजह तो यह हो सकती है कि तीजन ने पांडववाणी (महाभारत की कथा) गाई है, जबकि कबूतरी के गायन में अधिकांश प्रकृति, विरह (नियोली) और प्रेम के गीत हैं और दैवीय गीत यदाकदा ही आए हैं. संस्कृति और मीडिया के अध्येता डॉ. भूपेन सिंह कहते हैं कि जिस तरह तीजन बाई को छत्तीसगढ़ की कबूतरी देवी नहीं कहा जा सकता, उसी तरह कबूतरी को उत्तराखंड की तीजनबाई कहना सही नहीं है, मीडिया को ऐसी तुलनाओं से बचना चाहिए. वह कहते हैं कि दोनों गायिकाओं के परिवेश, सामाजिक परिस्थितियां और भूभाग भिन्न रहे, इसलिए उन्हें इन्हीं संदर्भों के साथ देखा जाना चाहिए.
हां, अनिल कार्की कबूतरी को प्रचलित मान्यताओं को तोड़ने के संदर्भ में बेगम अख्तर कहने के हामी हैं, हालांकि बाद में गजल गायिकी के शास्त्रीय गायन के ढांचे में आने से उन्हें बेगम अख्तर कहा जाना भी अनिल को सही नहीं लगता. इस तुलना को वह सरलीकरण कहते हैं. अनिल कहते हैं कि तीजन और बेगम ने लोक को शास्त्र में ढालने की कोशिश की, जो कि कबूतरी के गायन में नहीं मिलता. वह बताते हैं, कबूतरी के आकाशवाणी में गाने से कुमाऊंनी संगीत भी अकादमिक हुआ और यह मुक्त लोक से 5-6 मिनट की सीमाओं में बंध गया.
कबूतरी के गायन में पहाड़ की झलक
राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित कबूतरी ने गायन को अपना पूर्णकालिक पेशा नहीं बनाया, शायद इसलिए उन्हें इतना नाम नहीं मिला. उत्तराखंड के उभरते रंगकर्मी और साहित्यकार डॉ. अनिल कार्की बताते हैं कि उनसे एक बार कबूतरी देवी के गायन दल के ही वरिष्ठ सदस्य और उन्हें सिखाने वाले (दलित) लोकगायक भानुराम सुआकोटी ने कहा था कि वह कैसेट बेचने के लिए नहीं गाते हैं. समझा जा सकता है कि कबूतरी का गायन भी बाजार से प्रसिद्धि और कमाई करने की चाहत से परे था. अनिल बताते हैं कि कबूतरी बिना तामझाम, मंचीय आडंबर के कहीं भी, कभी भी गाने को तैयार रहती थीं.
कबूतरी हारमोनियम और हुड़के (हाथ से बजाया जाने वाला डमरू जैसा और छोटे ढोल के आकार का वाद्ययंत्र) के साथ गाती थीं. वह अपने पति के साथ कार्यक्रमों में हिस्सा लेने जाती थीं. तब पहाड़ों तक सड़कें नहीं पहुंची थीं और पैदल ही चला जाता था. इसी दौरान वह रास्ते में पति दीवानी राम के रचे गीतों को यादकर गायिकी का अभ्यास (रियाज) करती थीं. उनके गीतों में पलायन, विरह, मौसम, चिड़िया, पहाड़, नदी-नौले, जंगल, बैल-भैंस, रात-दिन, चांद-तारे, घास के मैदान और मंदिरों का जिक्र देखने को मिलता है.
कबूतरी देवी का संभावित आखिरी इंटरव्यू-

Thursday, August 30, 2018

劫匪惊天绑架想脱逃 记者猛追新闻踩红线

30年前,德国一场抢劫挟持案持续了56个小时,最终在高速公路上以暴力流血方式结束。尘埃落定,人们发现媒体在其中扮演的角色相当富争议,其中有一名记者的行为更被视为过线。
这一轰动一时的大劫案的犯罪人之一不久前刑满获释,让“格拉德贝克人质秀”重新回到公众视野。
警告:本文历史图片可能会令读者不安,慎入!
2018年2月,迪特尔·德格斯基(
之后,巴士离开了车站,向北部大城市汉堡方向开去。路上,车停在高速公路加油站,两名银行职员被释放了。罗斯纳尔的女友玛丽安·罗布利奇去上厕所。
在这里,一直对绑匪束手无策的警察们误判了形势,犯下一个致命的错误。他们在罗布利奇离开厕所时把她抓了。等德格斯基发现女朋友久去不回,给警察下了通牒:5分钟内把她送回来,否则要枪杀一名人质。
警察没能在5分钟内释放罗布利奇,德格斯基朝15岁的伊马纽尔·迪·吉沃奇(  ) 头部开了一枪。吉沃奇因失血过多死亡。
大巴车接着上路,在凌晨时分越过边境进入荷兰。
劫匪在荷兰放弃了大巴车,上了一辆由德国警方提供的宝马牌汽车。他们挟持了两名巴士上的乘客:18岁的茜克·比思柴夫(   )和她的朋友英内丝·沃尔特(  )。到了早晨7点,他们又开车回到了西德境内。
)在监狱服刑近30年后获释。他当年参与了一系列暴力犯罪活动,而在案发的前后3天时间里,整个过程经媒体密切跟踪报道,留下了非常详细的纪录。
在德国,此案被称为“格拉德贝克人质秀”。至今它仍然是人们集体记忆中的一道伤疤:因为案件中有两名年轻人质丧生;因为警方让事件扩大到失控的地步;还因为媒体贴身跟踪报道正在进行中的罪案,影响了警方的行动,痛失和平解决案件的良机。
案发时,乌多·罗贝尔( )39岁,是科隆小报《快报》的副总编。
他说:“这一案件当时对警方和媒体来说,都是从来没有出现过的新情况。如果发生在现在,每个记者都会稍稍停下来提醒自己:等等,这里应该有些红线是我万万不能踩的。”
“但是在当时,我们所有人都像着了魔一样,根本就不思考自己到底在干什么。”
当时,银行尚未开门营业,里面没有顾客。两人持枪威胁职员。几分钟后,警察赶到了,警匪之间出现对峙。
经过将近一天的谈判,警方答应提供一辆出逃的汽车和一些现金。两名劫匪消失在夜幕里,还带走了两名银行职员作为人质。
劫匪开着汽车乱转,还在某处停了一会,接上了罗斯纳尔的女友。
第二天下午,他们在距离格拉德贝克230公里的不来梅市郊停了车。
他们本想另租汽车继续出逃,但几次租车都没有成功,于是两人劫持了一辆载有30多名乘客的巴士。记者们蜂拥赶到汽车站,有的还上到巴士里拍照。罗斯纳尔在街头召开一场即兴记者会,手里握着枪。
数百万西德电视观众一直屏息观看事态的发展,整个过程仿佛就像电视剧,其中让人记忆最为深刻的的片段发生在不来梅:满是纹身的罗斯纳尔向围在他身边的媒体记者表示,他准备结束这一切,还把枪管塞进自己嘴里。
但有一个人却错过了如此令人震惊的新闻。
这个人就是记者乌多·罗贝尔:“我请了几天假,没有看电视也没有听广播,所以根本不知道外面发生了什么事情。那天早晨,他在网球俱乐部走进咖啡厅时才看到了电视上的新闻。
“我马上开车上班去了。我知道那天用不着担心缺头条新闻了。”
但他不知道的是,他很快将会成为这个新闻中的一部分。
罗贝尔到达办公室后,有同事马上传给他令人不安的消息:那辆宝马车,现在正停在科隆市中心步行购物区的外面。
罗贝尔跑下楼。果然,车就在街道中间。里面坐着5个疲惫不堪的人,看上去都要崩溃了。在驾驶座上的,是罗斯纳尔,手上握着枪;他旁边是玛丽安·罗布利奇;后座上是茜克·比斯柴夫和英内丝·沃尔特,她俩中间坐着德格斯基。他也手握一把枪。
数十个记者和路人把车团团围住。他们把麦克风和相机从车窗伸进车里。茜克被枪顶着脖子,回答了一个记者的提问,脸上还挤出一丝笑容。
德格斯基那些天一直靠啤酒和兴奋剂安非他命撑着,这时已经能看出酒精和药物的作用。他吹嘘自己杀了一个人。罗斯纳尔则反复念叨说他们绝不会缴械自首。
一个摄影师赶到现场,不慌不忙地架起一个梯子要找到好角度拍照。
当时有一段视频显示,一个电视记者准备采访时发现德格斯基的枪放在腿上。他问摄影师说:“我们是不是该让枪顶住她的头才好?”
所有的道德底线完全被抛在了脑后。
有个身影从人群后挤到了车前,似乎想跟绑匪们搭上某种关系。他30多岁,短头发,戴眼镜。他穿着黑色外套,袖子卷到胳膊肘上。他很激动,挥着胳膊,对围观者不满,将他们从车边推走。
他回忆说:罗斯纳尔和德格司机已经开始精神虚脱了,“我感觉当时的情况很危险。”
从现场视频来看,罗斯纳尔的确开始烦躁不安。他下了车,两手握着枪对着人群。
罗贝尔说:“接着他问我,到高速公路最快应该怎么走。他说‘我们现在就必须离开这里,我那个老友要顶不住发疯了。’”
罗贝尔开始解释怎么去高速公路,但是罗斯纳尔很烦躁,不想继续听下去。
“他说,要不你上车给我们带路。”
这下让罗贝尔傻眼了。
“那一刻,我必须马上做出决定。”他说
“当时局面越来越失控,而我有临危受命的感觉。但同时记者的本能也告诉我:我要追这条新闻。这个故事是我的。”
于是他挤进了后排座位,紧挨着茜克·比思柴夫坐下。车慢慢从人群里开了出来。
罗贝尔说:“我这么多年一直在想着那一刻。”
“我扪心自问,究竟我是从地狱来的记者,还是一个要缓解局面帮助那两个女孩的普通人。这个问题很难回答。但一旦我把这个责任担了起来,我觉得这两者兼而有之。我既是一个试图化解紧张局面的普通人,也是一个极度兴奋的记者,要抓住这个一生难得的最重要的新闻故事。”
上车后,罗贝尔试图与劫匪们说话。
“我以为警察肯定已经在车上装了窃听器,于是我想让他们说出点对警察有用的东西。但是德格斯基用枪指向我,要我闭嘴。我这才意识到,最好还是别说话。”