बिहार के मुज़फ्फ़रपुर ज़िले में 100 से ज़्यादा बच्चों की अकाल मौत से सरकार और समाज कठघरे में है.
कुपोषण और भूख के मारे बच्चे जिस तरह इन्सेफ़िलाइटिस नामक बीमारी के शिकार होकर मरते चले गए, वह सचमुच में डराने वाला है. मीडिया ने इस बेहद दुखदायी घटना को जिस तरह से प्रस्तुत किया वह भी कम विचलित करने वाला नहीं है.
ख़ास तौर पर न्यूज़ चैनलों की भूमिका तो सवालों के घेरे में है. कहा जा रहा है कि उन्होंने इस त्रासदी के कवरेज में न्यूनतम संवेदनशीलता का भी परिचय नहीं दिया.
बहुत से टीवी पत्रकारों ने तो पत्रकारीय नैतिकता और स्थापित मानदंडों की परवाह भी नहीं की. वे बारंबार लक्ष्मण रेखा लाँघते रहे.
न तो उन्हें मरीज़ों से हमदर्दी थी और न ही उनकी निजता के प्रति कोई सम्मान भाव. और तो और उन्होंने तो अपने पेशे की विश्सनीयता की भी परवाह नहीं की.
न्यूज़ चैनलों के पत्रकार अचानक पैदा हुई मिशनरी भावना से प्रेरित होकर घटना का करवरेज करने कूद पड़े. अच्छी बात है कि उन्होंने इस घटना को इस लायक समझा.
ये भी सही है कि उनकी वजह से स्थानीय प्रशासन, राज्य सरकार और केंद्र सरकार को भी तुरंत सक्रिय होना पड़ा.
लेकिन चैनलों की इस तथाकथित मिशनरी भावना में आवश्यकता से अधिक आक्रामकता और उन्माद पैदा करने की तिकड़म दिखी.
सबने महसूस किया कि न्यूज़ चैनलों के बीच एक प्रतिस्पर्धा चल रही है और वे एक दूसरे को पछाड़ने के लिए किसी भी हद तक जाने पर आमादा हैं.
चलिए मान लिया कि एक पत्रकार ने आईसीयू में घुसकर परदाफ़ाश किया कि वहाँ का रख-रखाव कैसा है, उपचार के लिए उपकरण हैं या नहीं और ज़रूरी सावधानियाँ बरती जा रही हैं या नहीं.
मगर क्या ये ज़रूरी था कि उसकी देखादेखी दूसरे पत्रकार भी आईसीयू में दाखिल होकर अपनी जाँबाज़ी दिखाएं और काम में बाधाएं डालें?
दरअसल, इसे उन्होंने लोकप्रियता और सफलता का फार्मूला मान लिया था. उन्हें तो साबित करना था कि वे सबसे क़ाबिल और दुस्साहसी हैं.
इसलिए उन्हें वहाँ मौजूद हर कर्मचारी, नर्स या डॉक्टर को कसूरवार ठहराना था. लिहाज़ा वे उन पर टूट पड़े, भले ही सुविधाओं की कमी या बदइंताज़ामी के लिए वे ज़िम्मेदार हों या न हों.
चूँकि टीवी पत्रकार प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और राज्य सरकार की नाकामी पर उँगली उठाने से डरते थे, उन्हें कठघरे में खड़ा करने से कतराते थे इसलिए डॉक्टर और नर्स उनके लिए सॉफ्ट टारगेट बन गए.
वे उन्हीं पर पिल पड़े. उन्हें ख़लनायक साबित करने लगे. यहाँ तक कि उनके काम में बाधाएं तक डालने लगे.
सच तो ये है कि न्यूज़ चैनलों ने मुज़फ़्फरपुर कांड को अपने लिए एक इवेंट बना लिया. एक दुधारू मीडिया इवेंट- जिसमें अपनी छवि सुधारने का उपक्रम था और टीआरपी दुहने का फार्मूला भी.
अधिकांश चैनलों के पत्रकार मरने वाले बच्चों और उनके परिजनों के प्रति संवेदनशील नहीं थे और जो हमदर्दी परदे पर दिखाई गई, वह भी दिखावटी थी.
टीवी कवरेज में रिपोर्टिंग कम थी और शोर, उत्तेजना ज़्यादा. सनसनी उसका सबसे बड़ा तत्व थी.
अगर रिपोर्टर की जगह ऐंकर ने ले ली थी तो इसका मतलब ये भी था कि वे रिपोर्टिंग नहीं शो कर रहे हैं. शो को हिट करने के लिए जो भी मसाला चाहिए होता है, ऐंकर वही तैयार कर रहे थे, रिपोर्टिंग नहीं.
चैनलों में रिपोर्टिंग की पहले ही हत्या की जा चुकी है. इसीलिए घटना के पहले उसमें कोई रिपोर्ट नहीं नज़र आती. वे नहीं बताते कि मुज़फ़्फ़रपुर में कुपोषित बच्चों की संख्या और हालत अफ़्रीका के सबसे ज़्यादा कुपोषित देशों से भी बदतर क्यों है.
उन्होंने 15 साल से सरकार पर क़ाबिज़ नीतीश सरकार के नाकारेपन की बखिया नहीं उधेड़ी. उन्होंने सवाल नहीं किया कि प्रशासन इतना सुस्त और लापरवाह क्यों बना रहा जबकि हर साल इस तरह की मौतें होती हैं.